इस सम्पूर्ण दृश्य जगत मे दो ही प्रकार की शक्तियाँ कार्य कर रही है जिनमे एक है यह 'जड़-प्रकृति'जिसमे पांच मुख्य घटक है -पृथ्वी,जल,अग्नि,वायु और आकाश तथा दूसरी है'चेतन शक्ति'जिसे 'पुरुष' कहा जाता है। यह चेतन पुरुष तत्व प्रकृति के भीतर रहकर सभी प्रकार की क्रियाओ का कारण बनता है।जबकि सभी प्रकार की क्रियाएँ प्रकृति द्वारा ही होती है। चेतन के बिना जड़ में क्रिया नहीं हो सकती तथा अकेला चेतन कोई क्रिया नहीं कर सकता। प्रकृति उसका माध्यम बनती है। अतः दोनों का संयोग ही सृष्टि रचना का कारण है। प्रकृति को इसी पुरुष से जीवन शक्ति प्राप्त होती है। इसी शक्ति से संसार की उत्पत्ति होती है ,जिसे हम समष्टि में 'परमात्मा 'तथा शरीर में इसे 'पुरुष ' अथवा 'आत्मा ' कहते है। यह 'पुरुष' तत्व सभी कर्मों का हेतु होते हुए भी अकर्ता बना रहता है। वह स्वयं कोई क्रिया नहीं करता बल्कि उसकी शक्ति से सभी क्रियाएँ प्रकृति द्वारा ही होती है। इसलिए इस पुरुष को कर्मों का लेप नहीं होता।
यह प्रकृति त्रिगुणात्मक है। सत्व ,रज और तम इसके तीन गुण है. सत्व गुण ज्ञान का हेतु है रजोगुण क्रिया का हेतु है तथा तमोगुण आलस्य ,निद्रा ,प्रमाद और अविचार का हेतु है। सत्वगुण वाला मृत्यु के बाद स्वर्ग जाता है ,रजोगुणी विषयवासना में लिप्त रहता है। वह क्रियाशील व कर्मठ होता है। उसकी वासना तीव्र होती है। मृत्यु के बाद वह कर्मठों में जन्म लेता है। तमोगुणी में अज्ञान होता है। इन तीनो गुणों के मिश्रण से ही मन की वृत्तियाँ बनती है जिनके अनुसार ही वह विभिन्न प्रकार के कर्मों को करता हुआ अपना जीवन चलाता है। सभी मनुष्यों में ये तीन ही गुण विद्यमान रहते है किन्तु जिस गुण की अधिकता होती है तो दुसरे गुण दबे रहते है जो कभी भी अवसर पाकर प्रकट हो जाते है।
देखना,सुनना ,सोचना,कल्पना करना,विचार करना,योजना बनाना ,निर्णय लेना आदि कार्य जड़ प्रकृति से नहीं हो सकते। इसी प्रकार संवेदना ,भावना ,प्रेम ,आदि भी जड़-पदार्थ में नहीं हो सकते। यह किसी चेतन शक्ति के कारण ही संभव है। जीवन में जो गति है,स्पंदन है वह चेतन द्वारा ही संभव है। वही चेतन शक्ति समष्टि में 'ईश्वर 'है जो सतत सृजन के आधार व कारण है।
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