कुंती ने भगवान श्री कृष्ण से वरदान मांगा की हे जगत गुरु! हमारे जीवन में पग-पग पर विपत्तियां आती रहे, क्योंकि विपत्तियों में ही हमें आपके दर्शन हुआ करते हैं और आप के दर्शन हो जाने पर जन्म-मृत्यु के चक्कर में आना नहीं पड़ता. इसलिए कहा गया है कि ईश्वर जिसे भी मिले हैं दुख में ही मिले हैं. सुख का साथी जीव है और दुख का साथी ईश्वर है, सुख में मनुष्य का हृदय उदासीन हो जाता है वह भगवान को भूल जाता है
स्वामी रामतीर्थ के शब्दों में- दुनिया के सुख केवल निर्जीव शव जैसे है, इसलिए हम दुख के पीछे ना दौड़कर दुख में ही सुख का अनुभव करने का अभ्यास करें| उस स्थिति में ही भगवान से हम याचना कर सकेंगे कि देव! मुझे ही सब दुख दे दो,जग जन सारे सुख पाए|
समस्त दुखों का कारण एक मात्र अज्ञान है| शारीरिक दुखों को व्याधि तथा मानसिक दुखों को आधी कहते हैं इनकी निवृत्ति ज्ञान द्वारा ही होती है| दुख निवृत्ति का नाम ही मोक्ष है, दुखों का अभाव ही आनंद है मोक्ष और आनंद एक दूसरे के पर्याय हैं|
मोक्ष का आनंद स्थाई और स्थिर होता है यह सच्चा सुख है जो आत्मा से मिलता है| यह स्वयं में पूर्ण होता है|
छांदोग्य उपनिषद की वाणी है कि जो पूर्ण है वह सुख है अतः पूर्ण को ही जानना चाहिए यह पूर्ण ही सच्चिदानंद घन ब्रह्म है जो सदैव परिपूर्ण है संसार भी ब्रह्म से पूर्ण है क्योंकि पूर्ण उस पूर्ण पुरुषोत्तम से ही उत्पन्न हुआ है| इस प्रकार परब्रह्म मैं से पूर्ण को निकाल देने पर भी वह पूर्ण ही बचा रहता है|
ईशावास्योपनिषद का शांति पाठ इसी संदर्भ को व्याख्यायित करता है| सांसारिक सुख और आनंद में अंतर है
सांसारिक सुख का संबंध इंद्रियों से है वह किसी हेतु से उत्पन्न होता है और हेतु मिट जाने पर नष्ट हो जाता है अतृप्ति असंतोष और तृष्णा इसे परिव्याप्त किए रहते हैं| यदि यह कहा जाए की सांसारिक सुख भी दुख का ही एक स्वरुप है तो अतिश्योक्ति ना होगी| इसकी निवृत्ति से ही सच्चे सुख की प्राप्ति संभव है यह सच्चा सुख ही आनंद है जो सार्वदेशिक सर्व व्यापक तथा सर्वस्व रहित होता
No comments:
Post a Comment